चाहे जैसे भी हालात हो खुद के जीवन समाप्त कर लेना बिकल्प नहीं है आप उस बुरे वक्त के अनुभव से खुद के जीवन को तवाह कर सकते है या खुद को बदल कर एक नई और खुबसूरत जिंदगी की सुरुआत सकते है
ये आपके उपर निर्भर करता है आप क्या चुनते है !
यहाँ कुछ कंटेंट है जो Social Media से लिया गया है पढ़े और जीवन को समझे !
ख़ुद को इतना भी मत बचाया कर,
बारिश हो तो भीग जाया कर....
तुम गए क्या शहर सूना कर गए
दर्द का आकार दूना कर गए...
दिखाई ना दे मगर शामिल ज़रूर होता है
खुदकुशी करने वाले का क़ातिल ज़रूर होता है....
“खेल एहसास के, इनाम में सिक्के औ हवस, आप ही खेलिए, हम से नहीं खेले जाते, मुंबई तुझसे मुहब्बत तो है हमको लेकिन, हमसे तेरे ये तक़ाज़े नहीं झेले जाते...!”
“खेल एहसास के, इनाम में सिक्के औ हवस, आप ही खेलिए, हम से नहीं खेले जाते, मुंबई तुझसे मुहब्बत तो है हमको लेकिन, हमसे तेरे ये तक़ाज़े नहीं झेले जाते...!”
जोकर से पूछा गया सवाल... कि चेहरे पर मास्क क्यों लगाते हो? क्या खूब जवाब था उसका.... लगाते तो सब है, बस मेरा दिखाई देता है... :)
चेहरा तो देखे हजार,
पर मन ना देखे कोई।
चून चुन ने सपने तेरे,
जिंदगी कम पड जाय मोरी।
मुसकिल कोई आन पड़े तो घबराने से क्या होगा
जीने की तरकीब निकालो मर जाने से क्या होगा
"कोई हुनर, कोई राज, कोई राह, कोई तो तरीका बताओ..
दिल टूटे भी न, साथ छूटे भी न, कोई रूठे भी न, और ज़िन्दगी गुजर जाए।"
मुझे लगता है कि यदि जीत निश्चित हो तो अर्जुन कोई भी बन सकता है।
परन्तु जब मृत्यु निश्चित हो तब अभिमन्यु बनने के लिए बहुत साहस चाहिए।
शमशान की राख देख कर मन में
एक ख्याल आया...!
सिर्फ राख होने के लिए इंसान
ज़िन्दगी भर दूसरों से
कितना जलता है...!!
"ना फिसलो इस उम्मीद में
कि कोई तुम्हें उठा लेगा,
सोच कर मत डूबो दरिया में
कि तुम्हें कोई बचा लेगा,
ये दुनिया तो एक अड्डा है
तमाशबीनों का दोस्तों,
अगर देखा तुम्हें मुसीबत में
तो हर कोई यहां मज़ा लेगा।"
कुछ दर्द छुपाए रखते है।
बंध मुठठी मे अपना घर समाए रखते है।।
नादान लोग जोकर समज के मुस्कुरा लेते है।
और हम अपना गम आखो में छुपाए रखते है।।
*कोई खाने में ज़हर घोल दे तो उसका ईलाज "मुमकिन" है,*
*लेकिन...*
*कोई कान में ज़हर घोल दे तो उसका ईलाज "नामुमकिन" है !*
कभी कभी हमें पता नहीं होता कि दांव पर क्या लगा है,
हारने के बाद अहसास होता है
की बहुत कुछ हार गए।
पूछा न जिंदगी में किसी ने दिल का हाल...
अब शहर भर में जिक्र मेरी खुदकुशी का है
फिक्र है सबको खुद को सही साबित करने की,
जैसे ये ज़िंदगी, ज़िंदगी नहीं, कोई इल्जाम है।
“बात करो रूठे यारों से,
सन्नाटे से डर जाते हैं !
इश्क़ अकेला जी सकता है,
दोस्त अकेले मर जाते हैं...!”
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